Posted by : Shoumik Das Sunday, August 11, 2013


In English : ---->

Maharishi Agastya was a vedic sage. He is hailed as one of saptarshis. He was elder brother of Vashist Muni (Kul guru of King Dasaratha).Time and again his greatness has been described in Vedas & Puranas, he wrote a book named Agastya Sanhita which encompasses all kinds of knowledge in it. He met Lord Ram in Treta Yuga when lord Ram was in exile, its detailed description is found in Sri Valmiki Ramayana. His Ashram is still situated on a hill at Nashik.

Krishnaji Rao Sahib vajhe passed examination of Engineering at Pune in 1891. In pursuit of finding science texts of Indian origin he discovered in Ujjain few pages of Agastya Sanhita with Tryambk Damodar Joshi. Reading the description outlined in these pages Dr. MC Sahasrabudhe head of Sanskrit in Nagpur realized that the description resembled that of a Daniel cell. Therefore he gave the pages to Mr. P. P. Hole, Professor of engineering at Nagpur and asked him to test it. Maharishi Agastya wrote few Sutras related to power generation sources:

Snsthapy Mrinmaye Patre
Susnskritm Tamrptrn.
छादयेच्छिखिग्रीवेन
Chardabhi: Kashtapansubhi.
Dastaloshto Nidhatwy: Pardachchhaditstt.
Snyogazzayte मित्रावरुणसंज्ञितम् Tejo.
- Agastya Code

Namely take a DELF (Earthen pot), take a copper plate (copper sheet) put into it and then put Shikigriwa, then log Pansu between wet (wet saw dust), take up Hg (mercury) and Dast Losht (Zinc), Then mix the wires, it will produce Mitravarunskti (power),electricity.

Now funny situation arose:

On the basis of above mentioned description, Mr. P. P. Hole & his friends started preparations. They could collect all required materials but meaning of Shikigriwa couldn’t be understood. When a Sanskrit dictionary was consulted it came out that in Sanskrit Shikigriwa meant peacock's neck. So he and his friend went to the garden and asked the chief, “can tell you, when one of the peacock in the garden will die, the chief asked angrily why? Then he said, its neck is required for an experiment. Hearing this, he said okay and they should give an application for it. Few days later during a conversation with an Ayurvedacharya, Mr. P.P. Hole narrated him all incidents and on hearing the story Ayurvedacharya started laughing and said that there Shikigriwa did not mean peacock's neck, but a substance in the color of peacock’s neck like Coprslfet (Neelathotha) is. All the problems were solved on getting this information and a cell was made. Then it was measured with a digital meter and 1.138 volts and 23 mA of electric current resulted.

The news of experiment being successful was reported to Dr. MC Sahasrabudhe. The cell was exhibited on August 7, 1990 at fourth annual general meeting of indigenous Sciences Institute (Nagpur) in front of other scholars.

Further Agastya ji writes:

Anne lives of Jlbngosti Wayusu Daneshu.
And Stanan कुंभानांसंयोगकार्यकृत्स्मृत.

Using the power of Hundred Kunbhon of water, the water will be converted into oxygen (Oxygen) and Udan Air (Hydrogen).

He writes further:
वायुबन्धकवस्त्रेण
Nibddho Yanmstke
Udan: Swlgutve बिभर्त्याकाशयानकम्. (Agastya Samhita Crafts Science Abstract)

If Udan Air i.e. (H2) Air stored into a restrictive clothing (balloon) then it will be helpful in aircraft science.

Vajhe Rao Sahib, who devoted his life in finding scientific work and experiments, he found in Agastya Samhita and other texts that electricity can be generated in different ways. Based on this different names are given.
The different names that were amalgamated:

(1) lightning - resulting from the friction of silk fabrics.

(2) saudamini - generated by friction of gems.

(3) Power - generated by clouds.

(4) Stkunbi - hundred cells or resulting from Kunbhon.

(5) Hridni - cardiac or store of the energy.

(6) Asni - resulting from magnetic punishment.

Agastya Samhita gives detail of using electricity for (Electroplating). He found out a method of applying Copper or gold or silver polish by using battery. Therefore the sage Agastya is known as Kunbhodbv (Battery Bone).

Further he wrote:

कृत्रिमस्वर्णरजतलेप: Satkritiruchyte. - Fri Policy

Susktjlsnnido Yvcsharmayodhanau.
Achchhadayti Tttamrn
Swarnen wa Rjten.
Suvarnliptn Tttamrn
Smritm Shatkunbmiti. 5 (Agastya Code)

Namely artificial gold or silver coating is called Satkriti. In an iron pot acid solution whem getd mixed mixture with the nitre (nitrate of silver or gold) gold or silver covers the copper. That copper plated with gold is called as Shatkunb.

The above mentioned method is described by a foreign author David Hatcher Childress in his book "Technology of the Gods: The Incredible Sciences of the Ancients". Now the unfortunate thing is that foreigners have read our texts more than us. So they moved ahead of us in the race and also took all the credit. And mean while secular Indians kept doing yo yo with their half English thinking themselves to be mordern.

Today we write the unit of potential difference in volts and current in amperes which was named after scientist Alessandro Volta, and André-Marie Ampère, respectively.
While the unit should have been Agastya.

Incredible Vedic India

In hindi.....>

By- Vijay Chouksey 
Ancient Indian UFO
महर्षि अगस्त्य एक वैदिक ॠषि थे। इन्हें सप्तर्षियों में से एक माना जाता है। ये वशिष्ठ मुनि (राजा दशरथ के राजकुल गुरु) के बड़े भाई थे। वेदों से लेकर पुराणों में इनकी महानता की अनेक बार चर्चा की गई है, इन्होने अगस्त्य संहिता नामक ग्रन्थ की रचना की जिसमे इन्होँने हर प्रकार का ज्ञान समाहित किया, इन्हें त्रेता युग में भगवान श्री राम से मिलने का सोभाग्य प्राप्त हुआ उस समय श्री राम वनवास काल में थे, इसका विस्तृत वर्णन श्री वाल्मीकि कृत रामायण में मिलता है, इनका आश्रम आज भी महाराष्ट्र के नासिक की एक पहाड़ी पर स्थित है।

राव साहब कृष्णाजी वझे ने १८९१ में पूना से इंजीनियरिंग की परीक्षा पास की। भारत में विज्ञान संबंधी ग्रंथों की खोज के दौरान उन्हें उज्जैन में दामोदर त्र्यम्बक जोशी के पास अगस्त्य संहिता के कुछ पन्ने मिले। इस संहिता के पन्नों में उल्लिखित वर्णन को पढ़कर नागपुर में संस्कृत के विभागाध्यक्ष रहे डा. एम.सी. सहस्रबुद्धे को आभास हुआ कि यह वर्णन डेनियल सेल से मिलता-जुलता है। अत: उन्होंने नागपुर में इंजीनियरिंग के प्राध्यापक श्री पी.पी. होले को वह दिया और उसे जांचने को कहा। श्री अगस्त्य ने अगस्त्य संहिता में विद्युत उत्पादन से सम्बंधित सूत्रों में लिखा :

संस्थाप्य मृण्मये पात्रे
ताम्रपत्रं सुसंस्कृतम्‌।
छादयेच्छिखिग्रीवेन
चार्दाभि: काष्ठापांसुभि:॥
दस्तालोष्टो निधात्वय: पारदाच्छादितस्तत:।
संयोगाज्जायते तेजो मित्रावरुणसंज्ञितम्‌॥
-अगस्त्य संहिता

अर्थात् एक मिट्टी का पात्र (Earthen pot) लें, उसमें ताम्र पट्टिका (copper sheet) डालें तथा शिखिग्रीवा डालें, फिर बीच में गीली काष्ट पांसु (wet saw dust) लगायें, ऊपर पारा (mercury‌) तथा दस्ट लोष्ट (Zinc) डालें, फिर तारों को मिलाएंगे तो, उससे मित्रावरुणशक्ति (बिजली) का उदय होगा।

अब थोड़ी सी हास्यास्पद स्थिति उत्पन्न हुई

उपर्युक्त वर्णन के आधार पर श्री होले तथा उनके मित्र ने तैयारी चालू की तो शेष सामग्री तो ध्यान में आ गई, परन्तु शिखिग्रीवा समझ में नहीं आया। संस्कृत कोष में देखने पर ध्यान में आया कि शिखिग्रीवा याने मोर की गर्दन। अत: वे और उनके मित्र बाग गए तथा वहां के प्रमुख से पूछा, क्या आप बता सकते हैं, आपके बाग में मोर कब मरेगा, तो उसने नाराज होकर कहा क्यों? तब उन्होंने कहा, एक प्रयोग के लिए उसकी गर्दन की आवश्यकता है। यह सुनकर उसने कहा ठीक है। आप एक अर्जी दे जाइये। इसके कुछ दिन बाद एक आयुर्वेदाचार्य से बात हो रही थी। उनको यह सारा घटनाक्रम सुनाया तो वे हंसने लगे और उन्होंने कहा, यहां शिखिग्रीवा का अर्थ मोर की गरदन नहीं अपितु उसकी गरदन के रंग जैसा पदार्थ कॉपरसल्फेट (नीलाथोथा) है। यह जानकारी मिलते ही समस्या हल हो गई और फिर इस आधार पर एक सेल बनाया और डिजिटल मल्टीमीटर द्वारा उसको नापा। परिणामस्वरूप 1.138 वोल्ट तथा 23 mA धारा वाली विद्युत उत्पन्न हुई।

प्रयोग सफल होने की सूचना डा. एम.सी. सहस्रबुद्धे को दी गई। इस सेल का प्रदर्शन ७ अगस्त, १९९० को स्वदेशी विज्ञान संशोधन संस्था (नागपुर) के चौथे वार्षिक सर्वसाधारण सभा में अन्य विद्वानों के सामने हुआ।

आगे श्री अगस्त्य जी लिखते है :

अनने जलभंगोस्ति प्राणो दानेषु वायुषु।
एवं शतानां कुंभानांसंयोगकार्यकृत्स्मृत:॥

सौ कुंभों की शक्ति का पानी पर प्रयोग करेंगे, तो पानी अपने रूप को बदल कर प्राण वायु (Oxygen) तथा उदान वायु (Hydrogen) में परिवर्तित हो जाएगा।

आगे लिखते है:
वायुबन्धकवस्त्रेण
निबद्धो यानमस्तके
उदान : स्वलघुत्वे बिभर्त्याकाशयानकम्‌। (अगस्त्य संहिता शिल्प शास्त्र सार)

उदान वायु (H2) को वायु प्रतिबन्धक वस्त्र (गुब्बारा) में रोका जाए तो यह विमान विद्या में काम आता है।

राव साहब वझे, जिन्होंने भारतीय वैज्ञानिक ग्रंथ और प्रयोगों को ढूंढ़ने में अपना जीवन लगाया, उन्होंने अगस्त्य संहिता एवं अन्य ग्रंथों में पाया कि विद्युत भिन्न-भिन्न प्रकार से उत्पन्न होती हैं, इस आधार पर
उसके भिन्न-भिन्न नाम रखे गयें है:

(१) तड़ित्‌ - रेशमी वस्त्रों के घर्षण से उत्पन्न।

(२) सौदामिनी - रत्नों के घर्षण से उत्पन्न।

(३) विद्युत - बादलों के द्वारा उत्पन्न।

(४) शतकुंभी - सौ सेलों या कुंभों से उत्पन्न।

(५) हृदनि - हृद या स्टोर की हुई बिजली।

(६) अशनि - चुम्बकीय दण्ड से उत्पन्न।

अगस्त्य संहिता में विद्युत्‌ का उपयोग इलेक्ट्रोप्लेटिंग (Electroplating) के लिए करने का भी विवरण मिलता है। उन्होंने बैटरी द्वारा तांबा या सोना या चांदी पर पॉलिश चढ़ाने की विधि निकाली। अत: महर्षि अगस्त्य को कुंभोद्भव (Battery Bone) कहते हैं।

आगे लिखा है:

कृत्रिमस्वर्णरजतलेप: सत्कृतिरुच्यते। -शुक्र नीति

यवक्षारमयोधानौ सुशक्तजलसन्निधो॥
आच्छादयति तत्ताम्रं
स्वर्णेन रजतेन वा।
सुवर्णलिप्तं तत्ताम्रं
शातकुंभमिति स्मृतम्‌॥ ५ (अगस्त्य संहिता)

अर्थात्‌ कृत्रिम स्वर्ण अथवा रजत के लेप को सत्कृति कहा जाता है। लोहे के पात्र में सुशक्त जल अर्थात तेजाब का घोल इसका सानिध्य पाते ही यवक्षार (सोने या चांदी का नाइट्रेट) ताम्र को स्वर्ण या रजत से ढंक लेता है। स्वर्ण से लिप्त उस ताम्र को शातकुंभ अथवा स्वर्ण कहा जाता है।

उपरोक्त विधि का वर्णन एक विदेशी लेखक David Hatcher Childress ने अपनी पुस्तक " Technology of the Gods: The Incredible Sciences of the Ancients" में भी लिखा है । अब दुर्भाग्य की बात यह है कि हमारे ग्रंथों को विदेशियों ने हम से भी अधिक पढ़ा है। इसीलिए दौड़ में आगे निकल गये और सारा श्रेय भी ले गये। और इंडिया के सेकुलर यो यो करते हुए अधपकी इंग्लिश के साथ अपने आप को मॉर्डन समझ रहे हैँ।

आज हम विभवान्तर की इकाई वोल्ट तथा धारा की एम्पियर लिखते है जो क्रमश: वैज्ञानिक Alessandro Volta तथा André-Marie Ampère के नाम पर रखी गयी है,
जबकि इकाई अगस्त्य होनी चाहिए थी।

अतुल्य वैदिक भारत

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